मुंबई/गोवा। भारतीय सिनेमा की दुनिया से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने उन करोड़ों दर्शकों को स्तब्ध कर दिया है, जिन्होंने कभी नाना पाटेकर की आवाज में गुस्सा, आंखों में दर्द और अभिनय में सच्चाई महसूस की थी। दिग्गज अभिनेता, निर्देशक और अपनी अलग अदायगी के लिए पहचाने जाने वाले नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।
नाना पाटेकर ने गुरुवार सुबह गोवा स्थित अपने घर पर अंतिम सांस ली। रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया था। वे गोवा के डोना पाउला इलाके में अपने घर पर थे और सुबह उन्हें बेहोशी की हालत में पाया गया। इसके बाद उन्हें निजी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट तक CPR देकर उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। अस्पताल की ओर से कार्डियक अरेस्ट को मृत्यु का कारण बताया गया है।
आखिरी वक्त भी गोवा में ही था… चार दिन पहले कार्यक्रम में हुए थे शामिल
नाना पाटेकर के निधन की खबर इसलिए भी बेहद अचानक मानी जा रही है क्योंकि निधन से कुछ दिन पहले तक वे सार्वजनिक कार्यक्रम में नजर आए थे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक 4 अक्टूबर 2026 को उन्होंने गोवा के डोना पाउला में आयोजित Samraat Club International के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था और वहां संबोधित भी किया था। यानी निधन से महज चार दिन पहले तक नाना सार्वजनिक रूप से सक्रिय थे।
यही वजह है कि उनके निधन की खबर ने फिल्म इंडस्ट्री और उनके चाहने वालों को गहरा झटका दिया है।
नाना नाम था… लेकिन पहचान सिर्फ नाम से नहीं थी
नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। 1 जनवरी 1951 को जन्मे नाना ने अभिनय की शुरुआत रंगमंच से की और बाद में हिंदी और मराठी सिनेमा में अपनी ऐसी पहचान बनाई, जिसे किसी एक शैली या किरदार में बांधना मुश्किल है।
उन्होंने वर्ष 1978 में फिल्म ‘गमन’ से बड़े पर्दे पर कदम रखा। इसके बाद उन्होंने कई ऐसे किरदार निभाए, जो फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के जेहन में रह गए।
उनकी खासियत सिर्फ अभिनय नहीं थी।
उनकी आवाज अभिनय का हिस्सा थी।
उनका बोलने का अंदाज, संवादों के बीच का ठहराव, आंखों का इस्तेमाल, चेहरे के भाव और अचानक बदलता गुस्सा—इन सबने मिलकर नाना पाटेकर को भारतीय सिनेमा का एक बेहद अलग कलाकार बना दिया।
वे पर्दे पर आते थे तो दर्शक सिर्फ किरदार नहीं देखते थे… नाना पाटेकर को देखते थे।
‘परिंदा’ से शुरू हुई अवॉर्ड्स की उड़ान
नाना पाटेकर के करियर में फिल्म ‘परिंदा’ बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव रही।
1989 में आई इस फिल्म में उनके अभिनय ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। ‘परिंदा’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला और इसी फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला।
इसके बाद फिल्म ‘अंगार’ में उनके अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट परफॉर्मेंस इन नेगेटिव रोल अवॉर्ड मिला।
फिर आया ‘क्रांतिवीर’।
और यहां नाना ने अभिनय की एक अलग ही परिभाषा लिख दी।
‘क्रांतिवीर’ में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान मिला। इसी फिल्म के लिए उन्होंने फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार भी जीता।
इसके बाद ‘अग्निसाक्षी’ में उनके अभिनय के लिए उन्हें एक और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
यानी नाना पाटेकर के खाते में तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और चार फिल्मफेयर पुरस्कार दर्ज हैं।
एक दिलचस्प बात—नाना सिर्फ गंभीर किरदारों के अभिनेता नहीं थे
अगर आपको लगता है कि नाना पाटेकर का मतलब सिर्फ गुस्सा, गंभीरता और दमदार डायलॉग है… तो शायद उनकी सबसे लोकप्रिय भूमिकाओं में से एक आपको यह सोच बदलने पर मजबूर कर दे।
फिल्म ‘वेलकम’ में उनका किरदार उदय शेट्टी।
गैंगस्टर का किरदार… लेकिन कॉमेडी के अंदाज में।
और यहीं नाना ने साबित कर दिया कि वे सिर्फ गंभीर अभिनय के अभिनेता नहीं हैं।
‘उदय शेट्टी’ के किरदार में उनकी कॉमिक टाइमिंग, संवाद बोलने का अंदाज और अनिल कपूर के साथ उनकी केमिस्ट्री ने दर्शकों को खूब हंसाया। यह किरदार इतना लोकप्रिय हुआ कि आज भी नाना पाटेकर का नाम आते ही कई लोगों को ‘उदय शेट्टी’ याद आ जाता है।
उन्होंने ‘वेलकम बैक’ में भी इस किरदार को दोहराया।
यानी एक तरफ ‘क्रांतिवीर’, ‘परिंदा’, ‘अग्निसाक्षी’ और ‘अब तक छप्पन’ जैसे गंभीर किरदार…
और दूसरी तरफ ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी।
यही तो नाना पाटेकर थे—एक अभिनेता, लेकिन कई रंग।
‘अब तक छप्पन’ में पुलिसवाला, ‘राजनीति’ में नेता और ‘नटसम्राट’ में रंगमंच का दर्द
नाना ने अपने करियर में लगातार अलग-अलग तरह के किरदार चुने।
‘अब तक छप्पन’ में उन्होंने एक सख्त और जटिल पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया।
‘राजनीति’ में उनका अंदाज बिल्कुल अलग था।
वहीं मराठी सिनेमा की फिल्म ‘नटसम्राट’ में उन्होंने एक उम्रदराज रंगमंच कलाकार की भूमिका निभाकर दर्शकों को भावुक कर दिया।
‘नटसम्राट’ में उनका अभिनय इतना प्रभावशाली रहा कि उन्हें इसके लिए फिल्मफेयर मराठी का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला।
यही वजह है कि नाना पाटेकर को सिर्फ बॉलीवुड का अभिनेता कहना उनकी कला को छोटा करना होगा।
वे हिंदी और मराठी—दोनों सिनेमा के बड़े कलाकार थे।
100 से ज्यादा फिल्मों का सफर
करीब पांच दशक लंबे करियर में नाना पाटेकर ने 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। उपलब्ध फिल्मोग्राफी रिकॉर्ड में उनकी फिल्मों की संख्या 100 के पार दर्ज है।
उनकी फिल्म सूची पर नजर डालें तो इसमें ‘गमन’, ‘परिंदा’, ‘प्रहार’, ‘अंगार’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘यशवंत’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’, ‘टैक्सी नंबर 9211’, ‘वेलकम’, ‘राजनीति’, ‘नटसम्राट’, ‘वेलकम बैक’ और कई अन्य फिल्में शामिल हैं।
उन्होंने सिर्फ अभिनय ही नहीं किया।
वे निर्देशक और लेखक के तौर पर भी काम कर चुके थे। उनकी निर्देशित फिल्मों में ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ खास तौर पर उल्लेखनीय है। इसके अलावा उन्होंने कुछ फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग भी की।
पद्मश्री से भी हुए सम्मानित
भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2013 में पद्मश्री से सम्मानित किया था।
उनकी उपलब्धियों की सूची में तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, चार फिल्मफेयर पुरस्कार, दो फिल्मफेयर मराठी पुरस्कार और कई अन्य सम्मान शामिल हैं।
लेकिन नाना की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद कोई ट्रॉफी नहीं थी।
वह था—दर्शकों के दिल में जगह बनाना।
नाना पाटेकर की आवाज क्यों इतनी अलग लगती थी?
हिंदी सिनेमा में कई अभिनेता अपनी आवाज के लिए पहचाने गए, लेकिन नाना की आवाज की अपनी एक अलग पहचान थी।
उनकी आवाज में भारीपन था, लेकिन उससे ज्यादा उसमें भावना और ठहराव था।
वे संवाद बोलते नहीं थे…
संवाद को महसूस करवाते थे।
उनके कई किरदारों में संवाद से ज्यादा असर उनके चुप रहने का होता था।
एक नजर…
एक ठहराव…
एक छोटा सा वाक्य…
और पूरा दृश्य बदल जाता था।
यही वह चीज थी जिसने नाना को बाकी कलाकारों से अलग किया।
एक कलाकार जिसने ‘हीरो’ की परिभाषा बदल दी
नाना पाटेकर पारंपरिक मायनों में वह अभिनेता नहीं थे, जिनके लिए हर फिल्म में हीरो की एंट्री पर तालियां बजें।
लेकिन वे ऐसे कलाकार जरूर थे जिनके आते ही सीन बदल जाता था।
वे मुख्य भूमिका में हों या सहायक किरदार में…
पुलिसवाले का रोल हो या गैंगस्टर का…
गंभीर ड्रामा हो या कॉमेडी…
उनकी मौजूदगी पर्दे पर अलग दिखाई देती थी।
और शायद यही किसी अभिनेता की सबसे बड़ी जीत होती है।
आज नाना नहीं हैं… लेकिन ‘नाना’ बाकी हैं
आज पर्दा गिर गया है।
लेकिन उनकी आवाज बाकी है।
‘क्रांतिवीर’ का आक्रोश बाकी है।
‘परिंदा’ की खामोशी बाकी है।
‘अब तक छप्पन’ की सख्ती बाकी है।
‘नटसम्राट’ का दर्द बाकी है।
और ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी भी बाकी है।
नाना पाटेकर का जाना सिर्फ एक अभिनेता का जाना नहीं है।
यह उस दौर के एक ऐसे कलाकार का जाना है जिसने हमें बार-बार याद दिलाया कि अभिनय सिर्फ खूबसूरत चेहरा और बड़े डायलॉग का नाम नहीं… अभिनय वो है, जो किरदार खत्म होने के बाद भी आपके भीतर चलता रहे।
नाना पाटेकर चले गए… लेकिन उनके किरदार अभी भी बोलेंगे।
और शायद यही एक सच्चे कलाकार की सबसे खूबसूरत विरासत है।
नाना पाटेकर को राजस्थान न्यूज़ 24 की पूरी टीम की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
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