उदयपुर। दुर्घटना में अगला बायां पैर गंवाने के बाद चलने-फिरने में असमर्थ हुई गोमाता अब कृत्रिम पैर के सहारे फिर खड़ी होकर चल सकेगी। नारायण सेवा संस्थान ने राजसमंद जिले के घोड़ाघाटी में गोमाता को मॉड्यूलर कृत्रिम अंग लगाकर चलाने में सफलता हासिल की है। संस्थान की प्रोस्थेटिक्स एंड ऑर्थोटिक्स (पीएंडओ) विभाग की विशेषज्ञ टीम ने गोमाता की शारीरिक बनावट और जरूरतों के अनुसार कृत्रिम पैर तैयार कर उसका फिटमेंट किया।
ऐसे शुरू हुई पहल
संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल को घोड़ाघाटी में दुर्घटना के कारण अगला बायां पैर गंवा चुकी गोमाता की जानकारी मिली थी। इसके बाद उन्होंने तत्काल पीएंडओ विभाग की विशेषज्ञ टीम को मौके पर भेजने के निर्देश दिए। टीम ने गोमाता की शारीरिक स्थिति का आकलन कर कृत्रिम अंग लगाने की संभावनाएं तलाशीं और आवश्यक माप लिए।
विशेष तकनीक से तैयार किया कृत्रिम पैर
गोमाता की जरूरत के अनुरूप कृत्रिम अंग तैयार करने की जिम्मेदारी पीएंडओ विभाग के प्रमुख डॉ. मानस रंजन साहू ने संभाली। विशेष सामग्री, सटीक माप, मॉडलिंग और मजबूती को ध्यान में रखते हुए मॉड्यूलर कृत्रिम पैर तैयार किया गया। इसके बाद विशेषज्ञ टीम दोबारा घोड़ाघाटी पहुंची और कृत्रिम अंग का फिटमेंट किया।
कृत्रिम पैर लगाने के बाद गोमाता को खड़ा कर चलाने का प्रयास सफल रहा। उसे दोबारा खड़े होकर आगे बढ़ते देख मौके पर मौजूद लोगों में खुशी छा गई। यह पहल दिव्यांगजनों के लिए कृत्रिम अंग तैयार करने में जुटे संस्थान के तकनीकी अनुभव को मूक पशुओं की सहायता में इस्तेमाल करने का उदाहरण बनी है।
मूक प्राणी की पीड़ा समझना हमारा दायित्व : अग्रवाल
संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि दुर्घटना में दिव्यांग हुए व्यक्ति अपनी पीड़ा शब्दों में बता सकते हैं, लेकिन मूक प्राणी के दर्द को समझने के लिए संवेदनशीलता जरूरी है। गोमाता अपनी तकलीफ बता नहीं सकती थी, लेकिन उसकी पीड़ा को महसूस करना हमारा दायित्व था। उन्होंने कहा कि संस्थान की तकनीकी दक्षता और सेवा भावना से गोमाता को दोबारा खड़े होकर चलने में मदद मिल सकी, यह संतोष की बात है।
सेवा के साथ तकनीक का इस्तेमाल
नारायण सेवा संस्थान लंबे समय से दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण उपलब्ध कराने के क्षेत्र में कार्य कर रहा है। घोड़ाघाटी में गोमाता के लिए किया गया यह प्रयास इसी तकनीकी अनुभव को पशु सेवा से जोड़ने की पहल है।