जयपुर। चुनाव के दौरान उम्मीदवारों के नाम और उनके चुनावी वादों के साथ एक और चीज लोगों का ध्यान खींचती है—चुनाव चिह्न। किसी को सेब दिखाई देता है, किसी को अलमारी, चश्मा, बल्ला या कोई घरेलू सामान। पहली नजर में साधारण लगने वाले ये प्रतीक चुनावी प्रक्रिया का अहम हिस्सा हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि चुनाव चिह्नों के आवंटन के लिए बाकायदा नियम बनाए गए हैं और आधिकारिक सूची में रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली कई अनोखी वस्तुएं भी शामिल रही हैं?

1968 में बना था चुनाव चिह्नों के लिए विशेष आदेश

भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए चुनाव चिह्नों के आरक्षण और आवंटन की व्यवस्था Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के तहत की गई है। इस व्यवस्था के अनुसार चुनाव चिह्न मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटे जाते हैं—आरक्षित (Reserved) और मुक्त (Free) चिह्न।

आरक्षित चिह्न मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लिए निर्धारित होते हैं। वहीं, मुक्त चिह्नों में से नियमानुसार पात्र उम्मीदवारों को चुनाव चिह्न आवंटित किए जा सकते हैं। चुनाव आयोग समय-समय पर संबंधित आधिकारिक सूचियां जारी करता है। इसलिए किसी चिह्न की उपलब्धता और पात्रता की पुष्टि संबंधित चुनाव तथा क्षेत्र के लागू नियमों के अनुसार ही की जाती है।

सेब, अलमारी, चश्मा और सोफा भी चर्चा में

चुनाव चिह्नों की दुनिया में कई ऐसे नाम मिलते हैं, जिन्हें देखकर लोगों को हैरानी हो सकती है। चुनाव आयोग की मुक्त चिह्नों की सूचियों में अलग-अलग समय पर सेब, अलमारी, चश्मा, बैट, बैटरी टॉर्च और नूडल्स का कटोरा जैसी वस्तुएं शामिल रही हैं।

इनमें से कुछ प्रतीक आम घरेलू वस्तुओं से जुड़े हैं, तो कुछ खेल या रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों से। ऐसे प्रतीकों की खासियत यह है कि उन्हें देखकर वस्तु को पहचानना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। हालांकि, किसी विशेष चुनाव में कौन-सा चिह्न उपलब्ध होगा, यह संबंधित आधिकारिक सूची पर निर्भर करता है।

चुनाव चिह्नों के पीछे भी रही है एक दिलचस्प कहानी

चुनाव चिह्नों के इतिहास पर प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयोग में चिह्नों के रेखाचित्र तैयार करने में एम.एस. सेठी की अहम भूमिका रही थी। वे आयोग में ड्राफ्ट्समैन के रूप में काम करते थे और सितंबर 1992 में सेवानिवृत्त हुए।

रिपोर्ट के मुताबिक, चिह्नों के चयन में ऐसी वस्तुओं पर विचार किया जाता था, जिन्हें आम लोग आसानी से पहचान सकें। इसी प्रक्रिया से जुड़े पुराने रिकॉर्ड में कैटली, सोफा, सेब और बैट जैसी वस्तुओं के उदाहरण भी सामने आते हैं।

इससे यह समझ आता है कि चुनाव चिह्न केवल कलात्मक आकृतियां नहीं हैं, बल्कि उन्हें लोगों के लिए पहचानने योग्य बनाने पर भी ध्यान दिया गया है।

क्या उम्मीदवार अपनी पसंद का कोई भी निशान चुन सकता है?

इसका जवाब है—नहीं। उम्मीदवार अपनी मर्जी से कोई भी नया प्रतीक चुनाव चिह्न के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता। चिह्नों का आवंटन चुनाव आयोग के निर्धारित नियमों और संबंधित आधिकारिक सूची के अनुसार होता है।

मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य दलों के उम्मीदवारों को नियमानुसार उनके दल का आरक्षित चिह्न आवंटित किया जाता है। अन्य पात्र उम्मीदवारों को संबंधित चुनाव के नियमों के अनुसार मुक्त चिह्नों में से अपनी पसंद बताने का अवसर मिलता है। लेकिन पसंद बताने का अर्थ यह नहीं है कि वही चिह्न मिलना तय है।

यदि एक ही मुक्त चिह्न के लिए कई उम्मीदवार दावा करते हैं, तो उसका आवंटन संबंधित नियमों के अनुसार किया जाता है।

आखिर चुनाव में चिह्न इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?

चुनाव में हर मतदाता उम्मीदवार का नाम, पृष्ठभूमि और घोषणापत्र विस्तार से जान पाए, यह हमेशा संभव नहीं होता। ऐसे में चुनाव चिह्न उम्मीदवार की पहचान का एक दृश्य माध्यम बनता है। यही कारण है कि चुनाव प्रचार, पोस्टर, जनसंपर्क और मतदान के दौरान प्रतीकों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।

हालांकि, किसी चिह्न को देखकर उम्मीदवार की योग्यता या उसके काम का आकलन नहीं किया जा सकता। मतदाताओं के लिए उम्मीदवार की जानकारी, उसका काम और चुनाव से जुड़ी आधिकारिक सूचनाएं भी उतनी ही जरूरी हैं।

चुनाव चिह्नों की यह दुनिया बताती है कि लोकतंत्र में एक छोटा-सा निशान भी पहचान का बड़ा माध्यम बन सकता है। सेब हो या चश्मा, बैट हो या कोई घरेलू वस्तु—हर प्रतीक के आवंटन के पीछे नियमों की एक पूरी व्यवस्था काम करती है।