उदयपुर में मेवाड़ की पारंपरिक गवरी लोकनाट्य परंपरा को लेकर दिए गए कथित आपत्तिजनक बयान के विरोध में लोगों ने जिला कलेक्ट्री पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने गवरी को ‘पाखंड’ बताए जाने पर नाराजगी जताते हुए संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई।

प्रदर्शन के दौरान लोगों ने कहा कि गवरी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि मेवाड़ के आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी लोकनाट्य विधा है। इसे लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी से समाज की भावनाएं आहत हुई हैं।

महिला पात्रों को लेकर उठाए थे सवाल

विवाद उस टिप्पणी के बाद सामने आया, जिसमें गवरी के दौरान पुरुष कलाकारों के महिला स्वरूप धारण करने पर सवाल उठाए गए थे। गवरी की परंपरा में पुरुष कलाकारों द्वारा महिला पात्रों की भूमिका निभाना लंबे समय से इसका हिस्सा रहा है। आधिकारिक सांस्कृतिक विवरणों में भी गवरी के महिला पात्रों का अभिनय पुरुष कलाकारों द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है।

गवरी में राई सहित विभिन्न पात्रों की भूमिकाएं निभाई जाती हैं और इसके मंचन में धार्मिक कथाओं, लोक प्रसंगों तथा पारंपरिक पात्रों को नृत्य-नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

गवरी की परंपरा करीब 40 दिन तक चलती है

मेवाड़ में गवरी का आयोजन धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक नियमों के साथ किया जाता है। सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी इसे मेवाड़ अंचल की भील जनजाति की प्रसिद्ध पारंपरिक लोकनृत्य-नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। गवरी की पूरी परंपरा में लगभग 40 दिनों की अवधि होती है और कलाकार कई तरह के पारंपरिक नियमों का पालन करते हैं।

उदयपुर में सितंबर 2026 के दौरान भी विभिन्न स्थानों पर गवरी के मंचन आयोजित किए गए हैं। फतहसागर पाल, भारतीय लोककला मंडल और शिल्पग्राम सहित कई जगहों पर इसके कार्यक्रम हुए और प्रस्तावित हैं।

प्रदर्शनकारियों ने क्या मांग रखी?

कलेक्ट्री पर जुटे लोगों ने गवरी और आदिवासी संस्कृति के प्रति सम्मान बनाए रखने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करते समय उनकी ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। प्रदर्शन के बाद संबंधित मामले में प्रशासन के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए कार्रवाई की मांग रखी गई।